मालवा की लोक परंपराएं, कला और महोत्सव
मालवा की लोक परंपराएं, लोकोत्सव व कला अपने आप में अनूठी है, यहाँ की हर परंपरा कुछ नया संदेश मानव जीवन की सफलता के लिए देती है। यहाँ ऐसे कई लोकोत्सव आयोजित होते हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है। मालवा की गंगा-जमनी तहजीब से रूबरू कराती लोकपरंपराओं की भी कमी नहीं है। हालांकि बदलते परिवेश में मालवा की संस्कृति का हृास जरूर हुआ है लेकिन मालवा के ग्रामीण परिवेश में वह आज भी जीवंत प्रतीत होती है। कला के क्षेत्र में भी मालवा की अलग पहचान है।
लोकात्सव
उमासांक्षी महोत्सव:- यह महोत्सव महाकाल मंदिर में श्राद्ध पक्ष में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शंकर को पति स्वरूप में पाने के लिए पार्वती ने जो तपस्या की थी यह महोत्सव उसी का प्रतिक है। इस महोत्सव में महाकाल मंदिर में पाँच दिनों तक रंगोली सजाई जाती है। छटे दिन माता पार्वती की सवारी रामघाट जाती है तथा रंगोली का विसर्जन किया जाता है। यह भी लोकत्सव के रूप में जाना जाता है।
श्रावण महोत्सव:- महाकाल मंदिर प्रबंध समिति द्वारा प्रतिवर्ष श्रावण मास में प्रत्येक रविवार को महाकाल मंदिर के प्रवचन हाॅल में श्रावण महोत्सव के अन्तर्गत देश के प्रसिद्ध कलाकारों की प्रस्तुति दी जाती है। इसका प्रारंभ कुछ समय पूर्व ही हुआ है। भगवान महाकाल से जुड़े होने के कारण यह महोत्सव अब शहरवासियों के मन में पअनी पेठ जगाकर लोकोत्सव में परिवर्तित हो चुका है।
विक्रमोत्सव:- हिंदू नववर्ष (चैत्र प्रतिपदा) के अवसर पर इसका आयोजन उज्जैन विकास प्राधिकरण द्वारा विगत तीन वर्ष से किया जा रहा है। इसके अंतर्गत नाटकों का मंचन किया जाता है। व चैत्र प्रतिपदा की पूर्व संध्या पर रामघाट पर सांस्कृतिक आयोजन किया जाता है। साथ ही हिंदू नववर्ष की प्रातः रामघाट प धार्मिक आयोजन किया जाता है। यह कार्यक्रम अल्प समय में ही लोकोत्सव का रूप ले चुका है।
संजा और गोवर्धन पूजा
संजा:-मालवा की लोकपरंपरा होकर ग्रामीण क्षेत्र में अज भी प्रमुखता से कायम है कि इसे श्राद्ध पक्ष के दौरान इस परंपरा की निर्वहन किया जाता है। कुंआरी लड़कियों द्वारा घर के बाहर की दीवार पर सौलह दिन तक गोबर से विभिन्न मांडने मांडे जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि संजा एक लड़की थी जिसके विवाह के सौलहवें दिन ही उसकी मृत्यु हो गई थी। विभिन्न मांडनों व लोकगीतों के माध्यम से घर की महिलाएं कुंआरी लडि़कियों को ससुराल पक्ष के रीति-रिवाजों से अवगत कराती है।
गोवर्धन पूजा:- दीपावली के दूसरे दिन मालवा में पशुधन की पूजा की परंपरा है। हालांकि यह परंपरा अन्य स्थानों से यहां प्रचलन में आई है लेकिन मालवा में पशुधन की अधिकता के चलते अन्य स्थानों सेआई यह परंपरा अब मालवा की लोक परंपरा का रूप ले चुकी है।
नववर्ष की परंपरा:- हिंदू पंचाग के अनुसार मालवा चैत्र मास के प्रतिपदा पर नववर्ष का प्रारंभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने उनके शासन काल में विक्रम संवत् की स्थापना की थी। तभी से चैत्र मास की प्रतिपदा पर नववर्ष मनाए जाने की परंपरा मालवा में प्रचलित है। धार्मिक मान्यतओं के अनुसार इस दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य को अध्य देकर नीम तथा गुड़ का सेवन किया जाता है।
कला
माच:- यह मालवा की लोककला में प्रमुख मानी जाती है। इसमें स्थानीय कलाकार मंच पर मालवा की लोककथाओं का मंचन सफलतापूर्वक करते हैं। इसमें लोकगीतों को समावेश भी किया जाता है। कभी मनोरंजन का प्रमुख केंद्र रही यह कका वर्तमान में विलुप्त प्रायः हो गई है।
भैरवगढ़ प्रिंट:- भैरवगढ़ में कारीगरों द्वारा कपड़ों पर की जाने वाली छपाई मालवा की कला के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी है। इस छपाई को देखने व अध्ययन करने के लिए दूसरों शहरों से भी लोग यहां आते हैं।
